सांगानेर की जनता मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है
जयपुर में सांगानेर की जनता वर्षों से पानी, जलभराव, खराब सड़कों और कचरा प्रबंधन जैसी मूलभूत समस्याओं का सामना कर रही है। इन समस्याओं के समाधान के लिए चुनावी प्रक्रिया में जनमुद्दे अक्सर दरकिनार हो जाते हैं। चुनावी मौसम में केवल टिकट न मिलने का रोना, बागियों के तेवर और निष्ठा बदलने का तमाशा देखने को मिलता है। अब जब चुनावी प्रत्याशी मैदान में हैं और बागियों के सुर तीखे हो चुके हैं, तो इस बार का चुनावी तमाशा देखने का समय आ गया है। सत्ता का स्वाद चखने वालों का दलबदल और बगावत का नाटक अब जनता के सामने है। यह स्थिति दर्शाती है कि राजनीति में अवसरवाद और चाटुकारिता का बोलबाला है। सांगानेर के मतदाता को यह देखना होगा कि वह इस चापलूसी के जाल को समझकर अपने विवेक का इस्तेमाल करता है या फिर हमेशा की तरह यह तमाशा राजनीति का स्थायी चरित्र बनकर रह जाता है। लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है, और अब जवाब देने की बारी सांगानेर के नागरिकों की है। लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बुनियाद निष्ठा, जनसेवा और उस सच को स्वीकार करने की शक्ति होती है, जो धरातल पर दिखता है। लेकिन जैसे-जैसे निकाय चुनावों का बिगुल बजता है, राजनीति का सबसे बदरंग चेहरा सामने आने लगता है। जब तक टिकट बंटने की घड़ी नहीं आती, तब तक सत्ता और पदों के मलाईदार गलियारों में बने रहने वाले लोग हुक्मरानों की शान में कसीदे पढ़ते हैं। चुनावी दहलीज पर पहुंचते ही उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को ठेस पहुंचती है, और वही चाटुकार रातों-रात बागी बनकर मैदान में कूद पड़ते हैं। यह बगावत किसी 'जनहित' या 'क्षेत्र के विकास' के लिए नहीं, बल्कि केवल अपना राजनीतिक वर्चस्व और वजूद का एहसास कराने के लिए की जाती है। गहराई से विचार करें तो गलती सिर्फ उन अवसरवादी बागियों की नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति और नेतृत्व की भी है जिसने चापलूसी को योग्यता का पैमाना बना दिया है। आज के राजनीतिक दौर में सच बोलने वाला और धरातल की वास्तविक स्थिति का आइना दिखाने वाला कार्यकर्ता अक्सर उपेक्षित कर दिया जाता है। नेताओं को 'हाँ में हाँ' मिलाने वाले और पीठ पीछे छुरा घोंपने की ताक में रहने वाले लोग अपने और वफादार लगते हैं, जबकि सच्चाई और निष्ठा के साथ काम करने वाला कार्यकर्ता अचानक 'अप्रिय' और 'बुरा' बन जाता है। नेतृत्व की यही कमजोरी अवसरवादियों को फलने-फूलने का मौका देती है। अब देखना यह होगा कि क्या सांगानेर के मतदाता इस राजनीतिक बगावत के खेल को समझकर सही निर्णय लेते हैं।

