सिंधी समाज ने थदड़ी पर्व पर शीतला माता की पूजा कर प्रेम और करुणा का संकल्प लिया
जयपुर में सिंधी समाज ने 2026 के पारंपरिक पर्व ‘थदड़ी’ को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया। इस अवसर पर समाज के सदस्यों ने शीतला माता की पूजा-अर्चना की और मन, मस्तिष्क तथा वाणी में शीतलता की कामना की। इस पर्व का आयोजन गुरुवार को हुआ, जिसमें समाज के सदस्यों ने एकत्र होकर शीतला माता से तन के साथ-साथ मन को शांत, मस्तिष्क को स्थिर और विचारों को निर्मल रखने की प्रार्थना की। इस दौरान उन्होंने क्रोध, अहंकार और नकारात्मकता से मुक्ति पाने का संकल्प लिया और प्रेम, करुणा तथा संतोष जैसे सकारात्मक भावों को जगाने की इच्छा व्यक्त की। महिलाएं सुबह से ही सज-धजकर मंगल गीत गाती हुई शहर के विभिन्न भगवान श्री झूलेलाल मंदिरों में पहुंचीं और विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा में उन्होंने पारंपरिक लोकगीत गाकर माता की महिमा का बखान किया। थदड़ी की परंपरा के अनुसार, घरों में चूल्हा पूरी तरह बंद रहा। एक दिन पूर्व (बुधवार को) तैयार किए गए पारंपरिक व्यंजनों का शीतला माता को भोग लगाकर प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया। इस दिन घर-आंगन मिठी मानी, चोपा, खोराक, टिक्की, खीरणी और सन्ना पकौड़ा जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों से महक उठे। सिंधी समाज के महेन्द्र लाला और वरिष्ठ नागरिक मोहन नानकानी ने बताया कि यह परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है और आज के तनावपूर्ण जीवन में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि मन और वाणी की यह शीतलता ही समाज में प्रेम और भाईचारे को मजबूत आधार प्रदान करती है। समाज के सदस्यों ने इस पर्व पर वाणी में मधुरता और स्वच्छता का संकल्प लिया। सभी ने प्रार्थना की कि उनकी वाणी में सत्य, विनम्रता और मधुरता का वास हो, जिससे परिवार और समाज में आपसी सौहार्द और प्रसन्नता का वातावरण बने। इस अवसर पर विवाहित बेटियों और बहनों के घर प्रीतिभोज स्वरूप ‘डिण’ (उपहार) भेजे गए। इस प्रकार से पर्व का महत्व और भी बढ़ गया। महिलाओं ने अखिडियूं मानी को आंखों पर लगाने की धार्मिक परंपरा निभाई और चांदी की शीतला माता को गले में धारण किया। यह परंपरा निष्ठा के साथ निभाई गई। सिंधी समाज के सदस्यों ने इस पर्व के माध्यम से न केवल आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक एकता का संदेश भी दिया। उन्होंने एक-दूसरे के साथ मिलकर पर्व को मनाने का संकल्प लिया। इस पर्व के आयोजन ने समाज में सहयोग और प्रेम के भावों को और अधिक प्रगाढ़ किया। सभी ने मिलकर इस पर्व को सफल बनाने के लिए प्रयास किए। सिंधी समाज ने इस पर्व के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भी संजोने का काम किया। यह पर्व न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक बन गया। शीतला माता की आराधना न केवल चेचक जैसे रोगों से रक्षा का प्रतीक है, बल्कि यह स्वच्छता, संयम, संतुलित दिनचर्या और मानसिक शांति का संदेश भी देती है। इस पर्व के माध्यम से समाज के सदस्यों ने एकजुटता और भाईचारे का संदेश फैलाया। इस प्रकार, थदड़ी का पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समाज में एकता और सहयोग का प्रतीक बन गया है।
