भारतीय सिन्धू सभा द्वारा मालवीय नगर में आयोजित सेमिनार में ‘जर्नी ऑफ सिंधीज’ वीडियो का प्रदर्शन; बुजुर्गों का छलका मातृभूमि का दर्द
जयपुर (सिंधु चौपाल संवाददाता)।
विभाजन के समय सिंधी समाज जब अपने संपन्न प्रांत ‘सिंध’ से भरे-पूरे घर छोड़कर निकला, तो उनके पास न छत थी, न दुकान और न ही भविष्य का कोई निश्चित आधार। लेकिन उनके पास अटूट हौसला, कड़ी मेहनत और अपनी संस्कृति के संस्कार थे। 1947 में उजड़कर जयपुर पहुंचे हजारों सिंधी परिवारों ने दुर्गापुरा कैंप से अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की थी, जो सफर आज व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा और समाजसेवा में एक मजबूत पहचान बन चुका है।
विभाजन की इसी पीड़ा, संघर्ष और गौरवशाली इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से भारतीय सिन्धू सभा (राजस्थान न्यास) द्वारा राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से मालवीय नगर स्थित देवर्षि नारद सभागार (पाथेय भवन) में ‘सिंध मुहिंजी अम्मा’ विषय पर एक दिवसीय सेमिनार आयोजित किया गया।
‘जर्नी ऑफ सिंधीज’ वीडियो से जीवंत हुई विभाजन की विभीषिका
प्रदेश अध्यक्ष ईश्वर मोरवाणी ने बताया कि सेमिनार के दौरान ‘जर्नी ऑफ सिंधीज’ वीडियो का प्रदर्शन किया गया। इस वीडियो के माध्यम से 1947 के दौर में सिंधी परिवारों द्वारा झेली गई पीड़ा, विस्थापन और संघर्ष की कड़वी सच्चाइयों को सामने रखा गया। वीडियो ने सभागार में मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं और उस दौर की याद ताजा कर दी जब लोग अपनी जन्मभूमि, घर, कारोबार और स्मृतियां छोड़कर अनजान भविष्य की ओर कदम बढ़ाने को मजबूर हुए थे।
दुर्गापुरा कैंप बना पहला पड़ाव; बापू बाजार और नेहरू बाजार बने पुरुषार्थ का प्रतीक
संरक्षक मोहन लाल वाधवाणी एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष महेंद्र तीरथाणी ने बताया कि विभाजन के बाद जयपुर पहुंचे परिवारों के लिए दुर्गापुरा कैंप केवल एक अस्थायी ठिकाना नहीं, बल्कि नई जिंदगी का पहला पड़ाव था। साधन बेहद सीमित थे, लेकिन सपने बड़े थे।
किसी ने छोटी दुकान लगाई तो किसी ने मजदूरी की। नाले पर बसा बापू बाजार और नेहरू बाजार आज भी इस पुरुषार्थी समाज की मेहनत और व्यापारिक सूझबूझ का जीवंत उदाहरण हैं। खाली हाथ आए सिंधी अपनी सबसे बड़ी पूंजी—अपनी भाषा, संस्कृति, संस्कार और मेहनत साथ लाए थे।
सिंध केवल जमीन नहीं, ‘मां’ थी: डॉ. प्रदीप गेहानी
डॉ. प्रदीप गेहानी और मूलचंद बसंतानी ने कहा कि जिन बुजुर्गों ने विभाजन का दंश झेला, उनके लिए सिंध केवल एक भू-भाग नहीं बल्कि उनकी ‘अम्मा’ थी। कई बुजुर्ग अपने पुश्तैनी घरों को आखिरी बार देखकर निकले और फिर कभी वापस नहीं लौट सके।
वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि आज की युवा पीढ़ी को यह बताना बेहद जरूरी है कि वर्तमान सफलताओं के पीछे पूर्वजों का कितना बड़ा बलिदान छिपा है। विभाजन विभीषिका दिवस केवल दुख मनाने का दिन नहीं, बल्कि उन लाखों पूर्वजों को नमन करने का दिन है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी पहचान को खोने नहीं दिया।
वरिष्ठ प्रबुद्धजनों ने व्यक्त किए विचार
सेमिनार में प्रदेश महामंत्री ईश्वर मोरवाणी, शोभा बसंतानी, गिरधारीलाल ज्ञानाणी (खैरथल) सहित समाज के कई गणमान्य प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे और सिंधी भाषा व संस्कृति के संरक्षण का संकल्प दोहराया।