बच्चों की मोबाइल लत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, खेल को मौलिक अधिकार बनाने पर बड़ा फैसला संभव

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डिजिटल युग में बच्चों का बचपन तेजी से मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है। मैदानी खेलों और शारीरिक गतिविधियों में आ रही कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए खेल और शारीरिक गतिविधियां बेहद जरूरी हैं, लेकिन आज बड़ी संख्या में बच्चे स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में व्यस्त हैं।

यह टिप्पणी खेल को मौलिक अधिकार घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान सामने आई।

क्या खेल बनेगा बच्चों का मौलिक अधिकार?

यह जनहित याचिका ‘स्पोर्ट्स अ वे ऑफ लाइफ’ NGO के अध्यक्ष और खेल शोधकर्ता डॉ. कनिष्का पांडे ने दाखिल की है। याचिका में मांग की गई है कि संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत बच्चों के लिए खेलों को भी शिक्षा की तरह मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए।

याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों से यह सुनिश्चित करने की मांग की गई है कि पढ़ाई और खेल के बीच भेदभाव न हो। इसके अलावा नर्सरी से लेकर पोस्ट-ग्रेजुएशन तक खेलों को शिक्षा व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बनाने और स्कूलों के वार्षिक बजट में खेल सुविधाओं के लिए निश्चित राशि निर्धारित करने का प्रस्ताव रखा गया है।

बच्चों के लिए मोबाइल में ‘माइनर मोड’ का प्रस्ताव

बच्चों की स्क्रीन टाइमिंग और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी कई सुझाव सामने आए हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत नए मोबाइल फोन में अलग ‘माइनर मोड’ उपलब्ध कराने की बात कही गई है।

इस मोड के जरिए माता-पिता बच्चों के लिए ऐप डाउनलोड पर रोक लगा सकेंगे, रोजाना स्क्रीन टाइम निर्धारित कर सकेंगे और देर रात मोबाइल या सोशल मीडिया के इस्तेमाल को सीमित कर सकेंगे। उम्र के अनुसार कंटेंट और ऐप्स तक पहुंच नियंत्रित करने के लिए फिल्टर की सुविधा भी दी जा सकती है।

हालांकि, पढ़ाई से जुड़े ऐप और आपातकालीन संपर्क जैसी जरूरी सुविधाओं को इस व्यवस्था से बाहर रखने का प्रस्ताव है।

अमाइकस क्यूरी ने दिया 90 मिनट खेल का सुझाव

मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त अमाइकस क्यूरी (न्याय मित्र) वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन ने भी अपनी सिफारिशें अदालत के सामने रखी हैं।

उनकी प्रमुख सिफारिशों में CBSE, ICSE और सभी राज्य शिक्षा बोर्डों के स्कूलों के दैनिक टाइम-टेबल में कम से कम 90 मिनट का ‘फ्री प्ले और गेम्स’ अनिवार्य रूप से शामिल करना शामिल है।

रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि बच्चों को नियमित रूप से मैदान और शारीरिक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है। लंबे समय तक स्क्रीन पर रहने से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

22 सितंबर को अगली सुनवाई

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांग चुका है। अब अदालत ने अमाइकस क्यूरी की रिपोर्ट पर याचिकाकर्ता को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। इस सुनवाई में केंद्र सरकार और शिक्षा बोर्डों के रुख के साथ-साथ बच्चों के खेल और स्क्रीन टाइम को लेकर आगे की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।

sindhuchaupal
Author: sindhuchaupal

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