हा, असीं सिंधी आहियूं
सिंधी हुजण ते फख्र: हिक अज़ीम सफर
एपिसोड 8: दरिया की वो जादुई गूँज – जब वरुण देव ने दिया ‘अभय दान’
सिंधु तट पर जब भक्ति, भूख और त्याग अपनी पराकाष्ठा पर थे, तब वह क्षण आया जिसने इतिहास की धारा को मोड़ दिया। तीसरे दिन की उस संध्या बेला में, जब हज़ारों सिंधी अपने प्राणों की आहुति दरिया में देने को तैयार खड़े थे, तभी अचानक सिंधु का विशाल जल-स्तर कांपने लगा। लहरें जो अब तक खामोश गवाह बनी हुई थीं, उनमें एक अद्भुत कंपन हुआ और देखते ही देखते जल के बीचों-बीच से एक प्रचंड और दिव्य प्रकाश-पुंज प्रकट हुआ।
वह दृश्य अलौकिक था। उस तेज प्रकाश की चमक ने सबकी आँखों को चौंधिया दिया, लेकिन उस प्रकाश की शीतलता ने दो दिनों की भूख और प्यास से तड़पते शरीरों में नई जान फूँक दी। तभी उस निराकार ब्रह्म ने, जिसे हमारा समाज सदियों से पूजता आया था, अपनी दिव्य वाणी में भक्तों को संबोधित किया। उस भविष्यवाणी ने पूरे तट पर सन्नाटा खींच दिया:
“हे भक्तों! विचलित मत हो। तुम्हारे अटूट विश्वास और इस कठिन तपस्या ने मुझे विवश कर दिया है। अधर्म का घड़ा भर चुका है और मिरखशाह का अंत अब निश्चित है। मैं स्वयं धरती पर अवतार लूँगा। नसरपुर के रतनराय ठकूर और माता देवकी के घर, मैं एक बालक के रूप में जन्म लूँगा, जो तुम्हारे दुखों का अंत करेगा और धर्म की रक्षा करेगा।”
यह केवल एक घोषणा नहीं थी, यह उस मृतप्राय समाज के लिए ‘जीवनदान’ था। वह समाज जो मिरखशाह की तलवारों से नहीं डरा, वह ईश्वर की इस करुणा को सुनकर फूट-फूट कर रो पड़ा। भविष्यवाणी ने स्पष्ट कर दिया था कि अब अत्याचार के दिन गिने-चुने रह गए हैं।
उस शाम सिंधु तट से वापस लौटते समय, हर सिंधी के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। वे जानते थे कि अब वे अकेले नहीं हैं; उनके रक्षक ने आने का रास्ता चुन लिया था। नसरपुर, जो अब तक एक साधारण नगर था, अब पूरे सिंध की आस्था का केंद्र बनने जा रहा था। मिरखशाह ने ‘साक्षात्कार’ माँगा था, और उसे आभास भी नहीं था कि उसका काल अब ठाकुर रतनचंद के आँगन में जन्म लेने वाला है।





