एपिसोड 5: सिंध का वो काला दौर – जब लहू से सराबोर थी सिंधु की मिट्टी

हा, असीं सिंधी आहियूं

सिंधी हुजण ते फख्र: हिक अज़ीम सफर

एपिसोड 5: सिंध का वो काला दौर – जब लहू से सराबोर थी सिंधु की मिट्टी

​इतिहास के पन्ने जब संवत 1007 के आसपास पहुँचते हैं, तो शब्दों से स्याही नहीं, बल्कि आँसू टपकने लगते हैं। ठट्टा के तख्त पर जब मिरखशाह का शासन आया, तो सिंध की आबोहवा में मौत का सन्नाटा पसर गया। वो केवल एक शासक नहीं था, बल्कि एक ऐसा तूफान था जिसका मकसद सिंधी समाज के वजूद को जड़ से उखाड़ फेंकना था। उन दिनों सिंध की गलियों में हवाएँ भी सिसकियाँ लेती थीं और सिंधु नदी का पानी मानो खौफ से ठहर गया था। मिरखशाह का जुल्म घरों की चारदीवारी तोड़कर अंदर दाखिल हो चुका था, जहाँ हर सुबह एक नई दहशत और हर शाम एक नई त्रासदी लेकर आती थी।

​मिरखशाह के सैनिकों की घोड़ों की टापें जिस गली से गुजरती थीं, वहाँ मातम छा जाता था। उसका सबसे क्रूर प्रहार हमारी आस्था और वजूद पर था। सिंधी हिंदुओं के सामने एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी गई थी, जिसके एक तरफ मौत थी और दूसरी तरफ अपना धर्म और संस्कार छोड़ने का भारी दबाव। उसने सरेआम हुक्म जारी कर दिया था कि जो उसकी शर्तों को नहीं मानेगा, उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी जाएगी। मासूम बच्चों के सामने उनके पिताओं को खत्म किया जा रहा था और बूढ़ी आँखों के सामने उनकी पूरी वंश बेल को कुचला जा रहा था। सिंध की वो धरती, जो अपनी उदारता के लिए जानी जाती थी, अब बेकसूरों के खून से लाल हो रही थी।

​अत्याचार की पराकाष्ठा तो तब हुई जब सिंधी परिवारों के मान-सम्मान पर सीधा हमला हुआ। वो दौर इतना खौफनाक था कि पिताओं ने अपनी जवान बेटियों को दरिया की लहरों के हवाले करना बेहतर समझा, बजाय इसके कि वो उन दरिंदों के हत्थे चढ़ें। कई माताओं ने अपने जिगर के टुकड़ों को अपनी आँखों के सामने खत्म होते देखा ताकि उन्हें भविष्य के कष्टों से बचाया जा सके। मंदिर उजाड़ दिए गए थे, पवित्र जनेऊ तोड़कर पैरों तले रौंद दिए जाते थे और हमारी संस्कृति के हर प्रतीक को मिट्टी में मिलाया जा रहा था। व्यापार ठप हो गया था, अनाज के भंडार जला दिए गए थे और सिंधी समाज, जो कभी दुनिया को खिलाता था, अपनी ही जमीन पर दाने-दाने के लिए मोहताज कर दिया गया था।

​खौफ का आलम ये था कि लोग अपने ही घर में फुसफुसाकर बात करने से भी डरते थे। अपनों के पार्थिव शरीर को कंधा देने वाला कोई नहीं था, क्योंकि हर घर अपने ही अपनों का शोक मना रहा था। मिरखशाह की दरिंदगी ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया था। वो सिर्फ शरीर को नहीं मार रहा था, वो सिंधी कौम की उस ‘रूह’ को कुचलना चाहता था जो हजारों सालों से अजेय थी। चारों तरफ सिर्फ चीखें थीं, बेबसी थी और एक ऐसा अंधेरा था जिसका कोई अंत नजर नहीं आता था। ये वो दौर था जिसने सिंधी समाज को झकझोर कर रख दिया था, और इसी असहनीय पीड़ा के बीच से उपजी थी वो पुकार, जिसने अंत में वक्त की धारा को बदलने पर मजबूर कर दिया।

Pdf download Karen PDF_1777607681181

sindhuchaupal
Author: sindhuchaupal

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

FOLLOW US

POll

क्या आप \"Sindhu Chaupal\" की खबरों से संतुष्ट हैं?

TRENDING NEWS

Advertisement

GOLD & SILVER PRICE

Rashifal