एपिसोड 7: सिंधु तट पर अंतिम पुकार – ‘या तो तरेंगे, या इसी जल में प्राण त्यागेंगे’

हा, असीं सिंधी आहियूं
सिंधी हुजण ते फख्र: हिक अज़ीम सफर
एपिसोड 7: सिंधु तट पर अंतिम पुकार – ‘या तो तरेंगे, या इसी जल में प्राण त्यागेंगे’

मिरखशाह के अत्याचारों ने जब सिंधी समाज के सब्र का बांध तोड़ दिया, तब एक ऐसा क्षण आया जिसने इतिहास की धारा बदल दी। उसका वो फरमान कि “या तो धर्म छोड़ो या साक्षात भगवान दिखाओ”, केवल एक चुनौती नहीं थी, वह हमारी आत्मा और अस्तित्व पर किया गया सबसे बड़ा प्रहार था। नगर समै की महाजन मण्डली ने जब इस संकट पर विचार किया, तो उन्हें समझ आ गया कि अब न तो बातचीत का रास्ता बचा है और न ही भागने का। उस अंधेरी रात में सिंध के हर घर में एक ही दृढ़ निश्चय लिया गया— “अब फैसला दरिया शाह की लहरें ही करेंगी।”

वजीर आहा से आठ दिन की मोहलत लेकर, हज़ारों की संख्या में सिंधी समाज के लोग सिंधु सागर के तट पर उमड़ पड़े। यह कोई सामान्य जनसमूह नहीं था, यह एक सामूहिक आत्मोत्सर्ग का संकल्प था। लोग अपने घरों की चाबियाँ छोड़कर, अपनी संपत्ति को त्यागकर इस प्रण के साथ आए थे कि “या तो वरुण देव हमें इस धर्म-संकट से पार उतारेंगे, या फिर हम इसी सिंधु जल के अंदर अपने प्राणों का विसर्जन कर देंगे।” उनके लिए अपनी आस्था और मर्यादा के बिना जीवन का कोई मोल नहीं रह गया था।

तट पर दृश्य ऐसा था कि पत्थर का दिल भी पिघल जाए। सूर्योदय से पहले ही चारों तरफ कीर्तन और वाद्ययंत्रों की गूँज सुनाई देने लगी। विद्वान पंडितों ने वरुण देव की विधिवत पूजा शुरू की। बूढ़े, बच्चे और जवान, सबने सिंधु नदी के शीतल जल में खड़े होकर अपने हाथ फैलाए और सजल आँखों से दरिया शाह की लहरों की ओर मुख करके यह प्रार्थना शुरू की:
“हे वरुण देव! हे सिंधु नदी! आप ही हमारे रक्षक हैं।”
“हे जल के स्वामी, आपकी शक्ति अनंत है। हम आपके शरणागत हैं। मिरखशाह के अधर्म से हमारी संस्कृति और हमारे धर्म की रक्षा करें। यदि आप प्रकट नहीं हुए, तो यह समाज जीवित नहीं बचेगा। हे दरिया शाह, अपनी लहरों में हमारी व्यथा सुनें और हमें इस संकट से पार उतारें।”

कीर्तन और इस मर्मस्पर्शी प्रार्थना के बीच पहला दिन बीता, रात का सन्नाटा आया और चला गया। फिर दूसरे दिन का सूरज निकला, जिसने भूख और प्यास की परीक्षा को और कठिन बना दिया। दो दिनों से किसी के कंठ से अन्न का एक दाना नहीं उतरा था, शरीर जवाब दे रहे थे, लेकिन श्रद्धा की अग्नि और भी प्रज्वलित हो रही थी। उनका संकल्प पत्थर की लकीर जैसा था—मिरखशाह की गुलामी स्वीकार करने से बेहतर दरिया की पावन गोद में समा जाना था।
तीसरे दिन की शाम तक सबकी आँखें पथरा चुकी थीं, लेकिन होंठों पर वरुण देव का नाम था। इसी बीच, जब भूख और प्यास से तड़पता जनसमूह अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था, तभी सिंधु के जल में एक अद्भुत हलचल हुई। एक तेज प्रकाश-पुंज प्रकट हुआ और उस निराकार ब्रह्म ने भक्तों की पुकार सुनकर अपना रूप व्यक्त किया। सिंधी समाज की उस ‘अखंड तपस्या’ और ‘प्राण त्यागने के निश्चय’ ने आखिरकार नियति को बदलने पर मजबूर कर दिया।

Pdf डाउनलोड करें PDF_1777696630033

sindhuchaupal
Author: sindhuchaupal

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

FOLLOW US

POll

क्या आप \"Sindhu Chaupal\" की खबरों से संतुष्ट हैं?

TRENDING NEWS

Advertisement

GOLD & SILVER PRICE

Rashifal