जयपुर का ऐतिहासिक सांगानेर कस्बा आज एक ऐसे भयावह दोहरे संकट के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ एक तरफ जहरीला होता पर्यावरण है तो दूसरी तरफ लाखों परिवारों की रोजी-रोटी। सांगानेरी प्रिंटिंग और टेक्सटाइल उद्योग में स्थिति इस कदर गंभीर हो चुकी है कि यहाँ का कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) अपनी पूर्ण क्षमता पर काम नहीं कर पा रहा। वहीं, क्षेत्र की 2,000 से अधिक छोटी-बड़ी इकाइयाँ इस ट्रीटमेंट नेटवर्क से जुड़ी ही नहीं हैं।
नतीजतन, रसायनों से भरा विषैला पानी सड़कों और गंदे नालों में बह रहा है, जो भूजल, मिट्टी और हवा को लगातार दूषित कर रहा है।
तीन दिन की दिहाड़ी और बीमार बच्चे की मजबूरी
इस प्रशासनिक और तकनीकी नाकामी की सबसे भारी कीमत यहाँ काम करने वाले परदेसी मजदूर चुका रहे हैं। फैक्ट्रियों में काम का रोटेशन लागू होने के कारण मजदूरों को हफ्ते में केवल 3 दिन ही काम मिल पा रहा है।
"हफ्ते के 7 दिनों में से केवल 3 दिन मिलने वाली मामूली दिहाड़ी से परिवार का पेट पालना भी मुमकिन नहीं है। ऐसे में जब किसी मजदूर का बच्चा तेज बुखार में तड़पता है, तब भी वह उसे कमरे पर छोड़कर काम पर जाने को मजबूर है—क्योंकि एक दिन की गैरहाजिरी का मतलब है दवा और राशन दोनों से हाथ धोना।"
दूर-दराज के राज्यों से रोजगार की उम्मीद में आए इन असंगठित मजदूरों का सांगानेर में कोई सामाजिक या आर्थिक आसरा नहीं है। रोटेशन व्यवस्था ने इनकी कमर तोड़ दी है।
सरकार के सामने 'साँप-छछूंदर' जैसी स्थिति
शासन और प्रशासन के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील और पेचीदा हो चुका है:
फैक्ट्रियाँ बंद करने पर:
यदि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर कड़ाई करके इकाइयों को बंद कराया जाता है, तो मजदूरों, छोटे उद्यमियों, सप्लायरों और ट्रांसपोर्टरों समेत लाखों लोगों का रोजगार रातों-रात छिन जाएगा।
फैक्ट्रियाँ चलने देने पर:
यदि बिना सही ट्रीटमेंट के उद्योगों को यूँ ही चलने दिया गया, तो सांगानेर का भूजल और पर्यावरण इस हद तक तबाह हो जाएगा कि यह इलाका रहने लायक नहीं बचेगा।
इस मानवीय व आर्थिक त्रासदी को टालने के लिए सरकार को तत्काल 'आपदा प्रबंधन' की तर्ज पर हस्तक्षेप करना होगा:
मजदूरों को सीधी आर्थिक मदद (DBT): हफ्ते में सिर्फ 3 दिन काम पा रहे पंजीकृत व असंगठित मजदूरों के लिए विशेष 'राहत कोष' का गठन हो और क्षेत्र में मुफ्त चिकित्सा शिविर लगाए जाएँ।
सीईटीपी क्षमता का युद्धस्तर पर विस्तार: प्लांट की क्षमता बढ़ाने और नेटवर्क से बाहर चल रही 2,000+ इकाइयों को ड्रेनेज लाइन से जोड़ने के लिए 30 से 60 दिनों की स्पष्ट समय-सीमा (Timeline) तय की जाए।
पर्यावरण नियमों का पालन करने की इच्छुक छोटी इकाइयों को ईटीपी/एसटीपी लगाने के लिए विशेष सरकारी अनुदान और बिजली बिलों में राहत दी जाए।
पर्यावरण और रोजगार को एक-दूसरे का विरोधी मानकर काम नहीं चलाया जा सकता। यदि सरकार ने समय रहते विशेष राहत पैकेज और कड़े नीतिगत कदम नहीं उठाए, तो यहाँ की आजीविका और पर्यावरण दोनों का दायमी नुकसान तय है।
