हा, असीं सिंधी आहियूं
सिंधी हुजण ते फख्र: हिक अज़ीम सफर
एपिसोड 2: सिंध: वह पवित्र पालना, जहाँ ‘हिंदू’ शब्द ने जन्म लिया
इतिहास के झरोखे से जब हम अपनी पहचान के मूल को तलाशते हैं, तो हमें एक ऐसा सत्य प्राप्त होता है जो न केवल हमारे समाज, बल्कि पूरे भारतवर्ष के लिए गौरव का विषय है। बहुत कम लोग इस ऐतिहासिक तथ्य की गहराई को जानते हैं कि आज दुनिया भर में गूंजने वाला ‘हिंदू’ शब्द और हमारे देश की पहचान ‘इंडिया’, दोनों ही सीधे तौर पर हमारे पूर्वजों की भूमि ‘सिंध’ और हमारी जीवनदायिनी ‘सिंधु नदी’ की ही देन हैं।
यह गाथा हज़ारों साल पुरानी है। हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों, विशेषकर वेदों में, हमारी इस पावन भूमि को ‘सिंधु’ के नाम से पुकारा गया है। ‘सिंधु’ का अर्थ केवल जलधारा नहीं, बल्कि जल का वह अजेय और अनंत भंडार है जो सागर के समान गहरा हो। जब प्राचीन काल में मध्य एशिया और फारस (आधुनिक ईरान) के लोग व्यापार और ज्ञान की खोज में भारत की ओर बढ़े, तो सबसे पहले उनका सामना हमारी इसी विशाल और गर्जना करती सिंधु नदी से हुआ।
भाषाई विकास के एक रोचक और महत्वपूर्ण मोड़ ने यहाँ एक नया इतिहास रच दिया। प्राचीन पारसी (Persian) भाषा में ‘स’ वर्ण का उच्चारण ‘ह’ के रूप में करने की सहज प्रवृत्ति थी। उनके लिए ‘सिंधु’ का उच्चारण कठिन था, इसलिए उन्होंने अपनी जुबान में ‘सिंधु’ को ‘हिंदू’ कहना शुरू कर दिया। उनके लिए सिंधु नदी के उस पार रहने वाले हम लोग ‘हिंदू’ कहलाए और हमारी इस पवित्र भूमि का नाम ‘हिंद’ या ‘हिंदुस्तान’ पड़ा।
यही शब्द आगे चलकर जब यूनान (Greece) पहुँचा, तो भाषाई यात्रा में ‘हिंदू’ शब्द और परिष्कृत होकर ‘इंडस’ (Indus) बन गया। इसी ‘इंडस’ शब्द से आगे चलकर पूरी दुनिया में हमारे देश की पहचान ‘इंडिया’ के रूप में हुई। यह हमारे लिए अत्यंत गौरव की बात है कि आज दुनिया के सबसे प्राचीन और महान धर्म (हिंदू धर्म) और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र (India) का नाम हमारे पूर्वजों की मिट्टी और हमारी पावन नदी के नाम से ही उपजा है।
‘सिंधु चौपाल’ के माध्यम से हम आज यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि ‘हिंदू’ शब्द का मूल धर्म से कहीं अधिक हमारी पहचान और हमारी धरती से जुड़ा है। हम उस महान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं जिसने न केवल एक धर्म को, बल्कि एक पूरे राष्ट्र की पहचान को अपना नाम दिया। जब हम कहते हैं कि “असीं सिंधी आहियूं”, तो हम उस मूल स्रोत की बात करते हैं जहाँ से हिंदू गौरव और भारतीय पहचान की पहली लहर उठी थी। यह हमारी जड़ें हैं, यही हमारा इतिहास है और यही हमारा सबसे बड़ा फख्र है।
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