हा, असीं सिंधी आहियूं
सिंधी हुजण ते फख्र: हिक अज़ीम सफर
एपिसोड 3: सिंधु तट का अमर घोष – जहाँ गूँजी वेदों की पहली ऋचा
इतिहास के उस कालखंड की कल्पना कीजिए जहाँ मानवता ने ज्ञान की पहली किरण देखी थी। जब हम गर्व से कहते हैं कि हम सिंधी हैं, तो यह केवल एक भाषाई पहचान नहीं है, बल्कि उस पवित्र विरासत का गौरव है जिसने दुनिया को सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ ‘ऋग्वेद’ दिया। सिंधु नदी की पावन गोद वह दिव्य ‘ज्ञान-पीठ’ रही है, जहाँ हज़ारों साल पहले ऋषियों के कंठ से वेदों की ऋचाएं पहली बार प्रस्फुटित हुई थीं।
वेदों में सिंधु नदी को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि ‘हिरण्यमयी’ (स्वर्णमयी) कहा गया है। ऋग्वेद के ‘नदी सूक्त’ में ऋषियों ने इसकी महिमा का गान करते हुए इसे समस्त नदियों की रानी और शक्ति का स्रोत बताया है। ऋषियों ने लिखा है कि सिंधु की गर्जना बादलों की गड़गड़ाहट जैसी है और इसकी गति एक शक्तिशाली अश्व के समान अजेय है। यह वह पावन भूमि है जहाँ सात पवित्र नदियों का संगम ‘सप्त-सिंधु’ के रूप में हुआ, जिसने न केवल भारतवर्ष को संस्कारित किया, बल्कि वैश्विक सभ्यता को ज्ञान का प्रकाश भी दिया।
सिंधु तट पर रचे गए ये वेद केवल धार्मिक मंत्र नहीं हैं, बल्कि ये हमारे उस ‘डीएनए’ की पहचान हैं जो शांति, प्रकृति के प्रति सम्मान और बौद्धिक श्रेष्ठता में विश्वास रखता है। इसी नदी के किनारे महान ऋषियों ने बैठकर ब्रह्मांड के रहस्यों को समझा और उन्हें सूक्तों के रूप में लिपिबद्ध किया। ऋग्वेद की कई ऋचाएं आज भी इस बात की गवाही देती हैं कि सिंधु का जल जितना शीतल है, इसकी सभ्यता उतनी ही प्रखर और ज्ञानमयी रही है।
आज जब हम ‘सिंधु चौपाल’ के माध्यम से अपनी जड़ों की ओर लौटते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि हमारी पहचान का आधार वही वैदिक सत्य है जो हमें विपरीत धाराओं के बीच भी अडिग रहना सिखाता है। हम उस मिट्टी की संतानें हैं जहाँ ईश्वरीय वाणी ने पहली बार आकार लिया था। यह वह ‘आध्यात्मिक साम्राज्य’ है, जिसे हमसे कोई नहीं छीन सकता। हमारी विरासत वेदों के उन अमर शब्दों में सुरक्षित है, जो आज भी सिंधु की लहरों की तरह ही शाश्वत और जीवंत हैं।
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